हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हौज़ा-ए-इल्मिया ख़ुरासान के उस्ताद हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन दरायती ने कहा कि समाज की रहनुमाई और तरबियत में उलमा का बुनियादी किरदार है। हौज़ा-ए-इल्मिया की सबसे अहम ज़िम्मेदारी ऐसे इंसानों की परवरिश करना है जो अपने अख़लाक़, रूहानियत और किरदार को बेहतर बनाएं और समाज के लिए फ़ायदेमंद साबित हों।
उन्होंने कहा कि वालिदैन को समझना चाहिए कि जो औलाद नेक अख़लाक़, रूहानियत और ख़ुद साज़ी के रास्ते पर चलती है, वह दुनिया और आख़िरत दोनों में ख़ैर व बरकत का ज़रिया बनती है।
मशहद में हौज़ा न्यूज़ एजेंसी से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि समाज में उलेमा के असली किरदार को अक्सर सही तरह से नहीं समझा जाता। इसी वजह से कई लोगों में दीन की तालीम हासिल करने और हौज़ा में दाख़िला लेने का जज़्बा कम दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि उलेमा का काम सिर्फ़ दीन की तालीमात को बयान करना नहीं है, बल्कि इंसानों की इस्लाह, उनकी तरबियत और सही रास्ते की तरफ़ रहनुमाई करना भी है यही वह ज़िम्मेदारी है जिसे क़ुरआन में अंबिया-ए-इलाही की अहम रसालत बताया गया है।
उस्ताद दरायती ने कहा कि एक तालिब ए इल्म सिर्फ़ अपनी इस्लाह और ख़ुद-साज़ी पर ही काम नहीं करता, बल्कि समाज के दूसरे लोगों की तरबियत और रहनुमाई की भी ज़िम्मेदारी निभाता है। यह काम समाज की अख़लाक़ी और रूहानी तरक़्क़ी में बहुत अहम भूमिका रखता है।
उन्होंने कहा कि दीन की तालीमात इंसान की तरबियत में बेमिसाल अहमियत रखती हैं। बेशक दूसरे तमाम उलूम भी अपने-अपने मक़ाम पर फ़ायदेमंद और ज़रूरी हैं तथा समाज की तरक़्क़ी में योगदान देते हैं, लेकिन इंसानों के अख़लाक़ और रूहानी तरबियत के मैदान में हौज़ा-ए-इल्मिया की अहमियत बहुत ख़ास है।
उन्होंने वालिदैन को नसीहत करते हुए कहा कि अगर उनकी औलाद अख़लाक़ी और रूहानी तौर पर मज़बूत बन जाए, तो वह न सिर्फ़ दुनिया में अपने ख़ानदान के लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद होगी बल्कि आख़िरत में भी ख़ैर व बरकत का सबब बनेगी।
आख़िर में उन्होंने कहा कि जो आलिम ख़ुद-साज़ी और तज़्किया-ए-नफ़्स के रास्ते पर तरबियत पाता है, वह समाज के लिए बहुत बड़े-बड़े ख़िदमात अंजाम दे सकता है। उसकी ख़िदमात और बरकतें इतनी वसीअ होती हैं कि उनका पूरा हिसाब सिर्फ़ अल्लाह तआला ही जानता है।
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